By performing your duty only for others, you will attain the highest good viz., God  
              Last  Update: 22-08-2010                      
  
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JANAKPURI
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About Us

The founder of Chhatrabandhu Shri Dinesh Chaturvedi was walking in the streets when he saw Government School students coming out. Thosands of students come out from a single School. This is grand manpower. Huge potential is there which can be huge force and an asset for our lovely Motherland. They need just some encouragement, a little motivation and small help.

Thus Chhatrabandhu got commenced to take this cause to a reality. Now we are satisfied with the outcome of our efforts.

   Selection Procedure Followed

 First of all ,a School Principal and staff is contacted. A few promising and needy students are picked up and then we follow the following:-

  1. Class-wise test -mainly for Sanskrit, Hindi and Maths
  2. Group discussion
  3. Interveiw
  4. Meeting their parents at home
  5. Listing those successfull
  6. Distribution of Scholorship
  7. Motivational discussions
  8. Arranging regular meeting with consellors
  9. Hearing the students for their problems and shorting out
  10. Providing books other than textbooks
  11. Encouraging extra curricular activities
  12. Honouring students who come up to  expectation
  13. Encouraging, motivating all of them
  14. Organising programmes relating to moral values
  15. Holding discussions to inculcate Authorship, Debate etc.

 This all goes in a very informal way. But to keep track, all related material and documents with a file is given to the student under his control.

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Other Programmes

SIMULTANEOUSLY MANY OTHER PROGRAMMES ARE ORGANISED. THESE HAS BEEN DETAILED AT THE VERY OUTSET-HOME PAGE

 

 

संत मोरारी बापू के दादा ही उनके सद्गुरु हैं। उन्होंने दादा से ही राम रस का पान करना सीखा। उनके मुताबिक, उनके दादा त्रिभुवन दास बापू ने पांच वर्ष की अवस्था में ही उन्हें रामचरितमानस की शिक्षा देनी शुरू की। रामचरितमानस का रंग इस कदर चढ़ा कि मोरारी बापू पूरी तरह इसी के हो गए।

गुजरात के भाव नगर जिले के एक छोटे से गांव तलगाजरडा में बाबा निम्बार्क की परंपरा को मानने वाला एक वैष्णव साधु परिवार है, जहां 2 मार्च 1946 को मोरारी बापू का जन्म हुआ। उस दिन महाशिवरात्रि का पर्व था। उनका बचपन माता सावित्री, पिता प्रभुदास बापू और दादी मां अमृता के संरक्षण में बीता। 12 वर्ष की अवस्था में मोरारी बापू ने रामचरितमानस का नियमित पाठ करना शुरू कर दिया। स्नातक की शिक्षा प्राप्त करने के बाद बापू ने जूनागढ़ के शाहपुर कॉलेज से प्राध्यापक प्रशिक्षण पाठ्यक्रम की परीक्षा उत्ताीर्ण की। इसके बाद उन्होंने महुआ के जे. पारेख हाई स्कूल में अध्यापन कार्य शुरू कर दिया। बापू की तीन पुत्रियां व एक पुत्र हैं।

बापू ने 1960 में राम कथा की पहली प्रस्तुति अपने गांव तलगाजरेडा के राम मंदिर में की। आज तक वे देश-विदेश में लगभग 676 जगह रामकथा कह चुके हैं। विदेशों में बापू की राम कथा के आयोजन की शुरुआत 1976 में नैरोबी और कीनिया से हुई। उस समय बापू तीस वर्ष के थे, जबकि रामकथा कहना उन्होंने 14 वर्ष की अवस्था में ही शुरू कर दिया था। प्रस्तुत है बापू से बातचीत-

2 जब आप कथा कहते हैं, तो आपके सामने श्रोता होते हैं या राम?

कथा के दौरान सिर्फ मैं होता हूं।

2 पहले आप रामकथा कहने का शुल्क लेते थे, लेकिन अब लेना बंद कर दिया?

मैं रामकथा के लिए कभी शुल्क नहीं लेता था। हां, पहले कथा के आयोजनों में जो दक्षिणा मिलती थी, उसे स्वीकार कर लेता था। कहीं-कहीं बहुत ज्यादा मिल जाता था, तो मुझे लगता कि इतनी ज्यादा दक्षिणा लेना ठीक नहीं। मैं लेता जरूर, लेकिन मेरा दिल रोता था। इसलिए बहुत दिनों तक दक्षिणा का भार ढो नहीं पाया और बाद में मैंने दक्षिणा लेनी बंद कर दी।

2 आपने अपने जीवन में राम मंत्र का कब और किस तरह प्रयोग किया है?

आत्मशुद्धीकरण के लिए। यह हमेशा ही करता रहता हूं। तुलसी ने भी यही किया था।

2 आज के समय में संकट से उबरने में राम की कौन-सी नसीहत या तकनीक आपके काम आई, जिसे हम साधारण लोग भी अपना सकें?

निरंतर राम का स्मरण। राम स्मरण का अर्थ बहुत विशाल है। शुरू तो स्मरण से ही करना पड़ेगा, धीरे-धीरे उसके अर्थ स्वयं खुलते चले जाएंगे।

2 आप राम के किस रूप को स्वीकार करते हैं?

मेरे राम राजा राम नहीं हो सकते, मेरे राम और इष्ट तो वनवासी राम ही हैं, जो कोल-भीलों के बीच जाकर उनके दुख-दर्द में शामिल हो जाते हैं।

2 संसार को नहीं, बल्कि असार को छोड़ने की बात आप करते हैं। असार क्या है?

गेहूं और कंकड़ को एक साथ मिला दिया जाए, तो गेहूं सार है और कंकड़ असार। संसार में जो कचरा है, यानी जो दूसरों को प्रसन्नता दे न सके, बल्कि छीन ले, वह असार है। श्रद्धा सार है अश्रद्धा असार है।

2 मृत्यु क्या है?

मृत्यु प्रमाद है। प्रमाद मृत्यु में घसीट ले जाता है।

2 प्रमाद से मुक्ति का उपाय क्या है?

हरिनाम।

2 क्या तपस्वी में भी अहंकार जन्म ले सकता है?

अहंकार के विविध रूप हैं। संसार का अहंकार लोहे की बेड़ी है। यदि तपस्वी को लगने लगा कि वह बड़ा विनम्र व ज्ञानी है, तो यह भी अहंकार की सवारी है। यह सूक्ष्म सोने की बेड़ी है। बेड़ी लोहे की हो या सोने की, है तो बेड़ी ही।

2 आपका 'मैं' प्रथम पुरुष है या समष्टिगत?

अभी तो प्रथम पुरुष ही है।

2 क्या संतों में भी कुछ अजगर, कुछ हंस व कुछ सिंह वृत्तिके होते हैं?

विश्वामित्र व वशिष्ठ दोनों संत थे और दोनों में लड़ाई भी हुई, लेकिन उसमें भी संतत्व ही सामने आया।

2 प्रेम में आसक्ति होती है?

हां, लेकिन उसके कई स्तर हैं। जब हम प्रेम की मुख्य धारा में पहुंचते हैं, तो आसक्ति समाप्त हो जाती है और रास शुरू होता है।

2 रास क्या है?

आत्मा के आंनद का प्रकटीकरण ही रास है। जब आत्मा नृत्य कर उठे, तो रास शुरू होता है।

 

 

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